Bhupinder - Toote Huye Dilon Ki Awaz

ये साल अभी आधा ही गुज़रा है लेकिन अपने साथ म्यूज़िक इंडस्ट्री के कितने ही बड़े नामों को ले गया। लता मंगेशकर, भप्पी लाहिड़ी, के के और अब भूपिंदर। भूपिंदर कैंसर से पीड़ित थे और कुछ दिन पहले जब उन्हें हस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि उन्हें कोविड हुआ था। 18 जुलाई 2022 की रात को उन्होंने आख़िरी सांसें ली। ये वीडियो उन्हीं को समर्पित है।


गहरी स्मोकी ओरिजिनल आवाज़ के मालिक भूपिंदर ने अपना बॉलीवुड डेब्यू किया था 1964 में तब से लगभग पाँच दशकों तक उनकी आवाज़ न सिर्फ़ फ़िल्मों में सुनाई दी बल्कि ग़ज़ल गायकी में भी उन्होंने अपना सिक्का जमाया। जगजीत चित्रा की तरह भूपिंदर मिताली की जोड़ी भी बहुत मशहूर रही है।


भूपिंदर सिंह


उन्होंने अपना पहला बॉलीवुड सांग गाया, 1964 में आई चेतन आनंद की “हक़ीक़त’ में . पहला सोलो सांग गाने का मौक़ा क़रीब दो साल बाद आया। इस बार भी चेतन आनंद की ही फिल्म थी — आख़िरी ख़त गाना था — रुत जवान जवान।


इन दो सालों में उन्हें समझ आ गया था कि उनके लिए इंडस्ट्री में सर्वाइव करना आसान नहीं होगा क्योंकि उनके सामने मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, और किशोर कुमार जैसे धुरंधर थे। इसी दौरान उनकी दोस्ती R D बर्मन से भी हुई हाँलाकि उस वक़्त दोनों एक दूसरे के साथ काम नहीं करते थे मगर बाद के दौर में इन दोनों के कई ख़ूबसूरत गाने सुनाई दिए।


R D बर्मन, मदन मोहन के अलावा जयदेव और ख़ैयाम के साथ भी उन्होंने काफ़ी काम किया। गुलज़ार के लिखे बहुत से गीत उनकी आवाज़ में अमर हो गए।


Ghazal Singer Bhupinder

ग़ज़ल उनका पहला प्यार थीं बल्कि ऑब्सेशन थीं, जिसने बाद में उन्हें बेहद प्रसिद्धि दिलाई। शुरुआत हुई 1968 में आये पहले LP रिकॉर्ड से। उनके तीन गाने थे, जिनका म्यूज़िक भी उन्होंने ही दिया था। उनका दूसरा LP आया 10 साल बाद 1978 में, इस एल्बम की ग़ज़लों में पहली बार स्पेनिश गिटार, बास और ड्रम सुनाई दिए। 1980 में गुलज़ार के लिखे अल्फ़ाज़ के साथ उनका तीसरा एल्बम आया जिसका नाम था — वो जो शायर था।


लगभग इसी समय पर उनकी मुलाक़ात बांग्लादेशी गायिका मिताली से हुई जो उनकी जीवन संगिनी बनी। 80 के दशक के मध्य तक उन्होंने बॉलीवुड सांग्स से दूरी बना ली और फिर पति-पत्नी की ये जोड़ी जहाँ कंसर्ट्स में साथ-साथ दिखाई दी, वहीं इनकी गाई ग़ज़लों और गीतों के कई रिकॉर्ड भी आए जिन्हें उनके चाहने वालों ने हाथों हाथ लिया। भूपिंदर के कुछ नॉन-फ़िल्मी भजन भी बहुत लोकप्रिय हुए।


हिंदी फ़िल्मों से दूरी बनाने के विषय में उनका कहना था कि 80s में जिस तरह के गाने बन रहे थे उनके साथ वो ख़ुद को फिट नहीं पाते थे इसीलिए उन्होंने ख़ुद को फ़िल्मी गीतों से दूर कर लिया। अब तो सिर्फ़ उनकी आवाज़ है उनके गाये गाने हैं जो उनकी यादगार बनकर हमारे आस-पास गूंजते रहेंगे।


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Neetu Sharma

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